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महाभारत युद्ध के लिए जानें क्यों एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे महाभारत युद्ध में मारे गए वीरको ही क्यों चुना था भगवान कृष्ण ने |
जानें क्यों एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे महाभारत युद्ध में मारे गए वीर

जानें क्यों एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे महाभारत युद्ध में मारे गए वीर

आज हम आपको महाभारत से जुडी एक अदभुत घटना के बारे में बता रहे है जब महाभारत युद्ध में मारे गए समस्त शूरवीर जैसे  एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे यह घटना महाभारत युद्ध ख़त्म होने के 15 साल बाद घटित हुई थी। राजा बनने के पश्चात हस्तिनापुर में युधिष्ठिर धर्म व न्यायपूर्वक शासन करने लगे। युधिष्ठिर प्रतिदिन धृतराष्ट्र व गांधारी का आशीर्वाद लेने के बाद ही अन्य काम करते थे। इस प्रकार अर्जुन , नकुल , सहदेव , द्रौपदी आदि भी सदैव धृतराष्ट्र व गांधारी की सेवा में लगे रहते थे |  लेकिन भीम के मन में धृतराष्ट्र के प्रति हमेशा द्वेष भाव ही रहता। भीम धृतराष्ट्र के सामने कभी ऐसी बातें भी कह देते जो कहने योग्य नहीं होती थी। इस प्रकार धृतराष्ट्र गांधारी को पांडवों के साथ रहते-रहते 15 साल गुजर गए। एक दिन भीम ने धृतराष्ट्र व गांधारी के सामने कुछ ऐसी बातें कह दी , जिसे सुनकर उनके मन में बहुत शोक हुआ। तब धृतराष्ट्र ने सोचा कि पांडवों के आश्रय में रहते अब बहुत समय हो चुका है। इसलिए अब वानप्रस्थ आश्रम

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में वन में रहना ही उचित है। गांधारी ने भी धृतराष्ट्र के साथ वन जाने में सहमति दे दी। धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ विदुर व
संजय ने वन जाने का निर्णय लिया।  धृतराष्ट्र वन न जाने का विचार कर धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को बुलाया और उनके सामने पूरी बात कह दी। पहले तो युधिष्ठिर को बहुत दुख हुआ  लेकिन बाद में महर्षि वेदव्यास के कहने पर युधिष्ठिर मान गए। जब युधिष्ठिर को पता चला कि धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ विदुर व संजय भी वन जा रहे हैं तो उनके शोक की सीमा नहीं रही। धृतराष्ट्र ने बताया कि वे कार्तिक मास की पूर्णिमा को वन के लिए यात्रा करेंगे। वन जाने से पहले धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों व अन्य परिजनों के श्राद्ध के लिए युधिष्ठिर से धन मांगा। भीम ने द्वेषतावश धृतराष्ट्र को धन देने के इनकार कर दिया,  तब युधिष्ठिर ने उन्हें फटकार लगाई और दन दे दिया और श्राद्ध भी करवा दिया |  सभी को वन में जाते देख पांडवों की माता कुनती ने भी जाने का मन बना लिया | पांडवों के स]लाख कहने पर भी वे नहीं मणि और वन में चली गई |  वन में रहते हुए ध्रित्रस्त्र ने घोर तप किया जिस कारण उनके शरीर का मांस सूखने लगा | लगभग एक वर्ष के बाद युधिस्तर के मन में उस सभी से मिलने का ख्याल आया |  इस प्रकार पांडव अपनी सेना के साथ उस स्थान पहुंचे जहाँ उनके उनके प्रियजन रह

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रहे थे | सभी एक दुसरे को मिलकर बहुत खुश हुए | लेकिन विदुर को न देख कर वे उनके बारे में पूछने लगे | उसी समय विदुर जी सन्यासी के बेस में आ रहे थे लेकिन इतने सरे लोगों को देख वे वापिस लोट गये और युधिष्टर भी उनके पीछे पीछे भागने लगा | लेकिन विदुरजी ने पास ही एक पेड़ के निचे ही अपने प्राण त्याग दिए | ये देख कर युधिष्टर  ने विदुर्जी का दाह संस्कार करने का निर्णय लिया लेकिन तभी आकशवाणी हुई की वे सन्यासी थे इस लिए उनका दाह संस्कार करना उचित नहीं है | उस रात सभी उस वन में ही रहे थे | तब अगले दिन वेदव्यास जी ने बताया की विदुरजी यमराज के अवतार थे और युधिष्टर भी उन्ही के अवतार है इस कारण ही वे आप में समा गये थे | उसी वक्त धृतराष्ट्र और गंदारी ने महर्षि वेदव्यास से अपने मृत पुत्रों , कुंती ने कर्ण और सभी ने अपने प्रियजनों को देखने की इच्छा प्रगट की | वेदव्यास जी ने कहा की एसा ही होगा और सभी गंगा के किनारे इकट्ठे हो गये | रात को महर्षि वेदव्यास जी ने गंगा में प्रवेश किया और सभी मृत लोगों को याद किया | याद करते ही सभी मृत योधा गंगा से बाहर आने लगे | तब महर्षि ने कहा की जो भी विधवा अपने पति के साथ जाना चाहती है वे गंगा में दुबकी लगाकर जा सकतीं है | तो इस प्रकार सभी लोग एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे |