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शैतान सिंह - 1962 जंग की उन्कही शौर्य गाथा
शैतान सिंह - 1962 जंग की उन्कही शौर्य गाथा

शैतान सिंह – 1962 जंग की उन्कही शौर्य गाथा

शैतान सिंह – 1962 जंग की उन्कही शौर्य गाथा

◆1963★ भारतीय कवि प्रदीप दिल्ली की सड़कों पे घूम रहे थे, पर एक दर्द उन्हें खाये जा रहा था..!

एक पान वाले से उन्होंने सिगरेट की खाली डिबिया ली , और पेन से उस पर लिख दिया वो अमर गीत जिसे आवाज दी थी लता मंगेशकर ने….!
वो गीत जो भारत में देशभक्ति कि पहचान हैं, जिसे सुनते ही हर राष्ट्रभक्त के रौंगटे खड़े हो जाते हैं..!

“ऐ मेरे वतन के लोगो जरा आंख में भर लो पानी
जो शहिद हुये हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी..”

बाद में इसी गीत को फिल्मी सितारों ने शहीदों की विधवाओं के लिए फंडिंग जुटाने के लिए 1963 में दिल्ली में हुए कार्यक्रम में गाया था…!

भारत आजाद हो चुका था, और इतने बड़े देश को संभालने की ज़िम्मेवारी आई थी पंडित नेहरू के कंधों पर…! नेहरू बुरी तरह चाटुकारों से घिरे ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति की बजाय अपने यारो प्यारो पर ज्यादा भरोसा था..!

भारत और चीन की सीमाएं स्पष्ट नही थी..! मैकमोहन रेखा के आर पार बसे चीन भारत दोनों ही विशाल देश थे…! लेकिन एक तरफ जहां चीन माओ की महत्वकांक्षा से विस्तारवादी बना हुआ था वहीँ , भारत नेहरू की झूठी शांति और भाईचारे वाली सोच में डुबा था..!

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◆1959★ चीन ने तिब्बत पर आक्रमण करके उसे कब्जा लिया..! दलाई लामा ने भारत से राजनैतिक शरण माँगी और भारत ने अपने दुश्मन को एक बहाना दे दिया…!

चीन ने 1959 नवम्बर में लद्दाख में हमला किया , पर नेहरू उसे गम्भीरता से नही ले गए..! नेहरू को विश्वास था चीन 1954 में हुए पंचशील के सिद्धांत पर कायम रहेगा..! पर भारत में सरकार के विरोध में आवाज सड़कों पर गूंजने लगी..! नेहरू ने तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन पर भरोसा किया , जिन्होंने नेहरू को हथियारों के कारखाने बन्द करके उनमें जूते बनवाने को राजी कर लिया, ये कह कर की अब हम आजाद हो गए और अब हमें युद्ध की क्या आवश्यकता है..!

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पंडित विजयालक्ष्मी नेहरू की बहन जिन्होंने नेहरू को माओ की नीतियों के विषय में सबसे ज्यादा भर्मित किया…! विजयालक्ष्मी को नेहरू ने चीन में युद्ध के हालातों के बीच भेजा था , यह पता लगाने के लिए की चीन की मंशा क्या है..? पर विजय लक्ष्मी अपनी झूठ खातिरदारी से इतनी प्रसन्न हुई कि उसने माओ के विषय मे नेहरू को इतना आश्वस्त कर दिया कि वे चीन को सम्भावित खतरा मानने से इनकार कर गए..! जबकि पूरी संसद ने नेहरू को आगाह करने की कोशिश की…!

नेहरू ने सेना को लद्दाख में अपने क्षेत्रों में चौकिया बनाने की आज्ञा दी..! भारतीय सेना ईस्ट फ्रंटीयर के अतिरिक्त लद्दाख में झूठ पुट मुठभेड़ों से गुजर रही थी..! पर युद्ध की आशंका भारतीय सरकार को नही थी…!

◆1962★ 20 अक्टूबर को चीन ने हमला कर दिया..! लेकिन भारतीय सेना की 13 कुमाऊँ रेजिमेंट की चार्ली कम्पनी(वीर अहीर) अपने सेनापति वीर क्षत्रिय मेजर शैतान सिंह भाटी (जोधपुर, राजस्थान) के नेतृत्व में चुसुल में एक महीने से अपनी चौकी का निर्माण कर रही है..! सेना हेडक्वार्टर से उनके लिए आदेश हैं कि चीनी सेना वहां पहुंचने वाली हैं, वे पीछे हट जाएं, और चौकी को छोड़ दे…!

जमा देने वाली 16000फ़ीट की उस ऊंचाई पे जहां माईनस डिग्री में टेम्प्रेचर था ; केवल स्वेटर में तन को गर्म करने की नाकाफी कोशिश करती वो वीर अहिरो की टुकड़ी केवल 3नॉट3 राइफल के साथ सुरक्षा कर रही थी देश की सीमाओं की…!

अपने खून में राजपूती उबाल लिए मेजर शैतान सिंह ने गरजते हुए अपने 120 जवानों की टुकड़ी से पूछा : “जवानों आज हमारे लिए वापस लौट जाने का आदेश हैं, हमारे जाने के बाद हमारी बनाई इस चौकी पर तिरंगे की जगह चीनी झंडा लटकेगा… हम यहां रहेंगे तब भी और यहां से चले जायेंगे तब भी… जवान रामचन्द्र जवान सिंह राम जवान सतपाल बताओ हमें क्या करना चाहिए..?”

“साहब… आप क्या करेंगे..?” सिंह राम यादव ने अपने साहब से पूछा….!

“मैं लड़ते हुए जान दूँगा… पर पीछे नही हटूंगा…” मेजर ने पहले ज्यादा जोश के साथ कहा..!

“साहब… हम मर जाएंगे पर वापस नही लौटेंगे… इस चौकी पर जब तक हम जिंदा हैं तिरंगा ही लहराएगा…” सभी ने एक स्वर में कहा…!

“तो… साथियों ये तय रहा कि हममें से कोई यहां से जिंदा नही जाएगा… अब हम मरते दम तक लड़ेंगे…” मेजर शैतान सिंह ने अपना आदेश सुनाया…!

मेजर शैतान सिंह जो स्वयं एक राजपूत था और जिसकी कम्पनी में सब हरियाणा के रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ और उसकी सीमा से लगते राजस्थान के यादव थे , उसकी कम्पनी इंतजार कर रही थी अमर होने का…!

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