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Rani Laxmi bai and brahmins
Rani Laxmi bai and brahmins

रानी लक्ष्मी बाई के शव की रक्षा हेतु बलिदान हुए थे 745 हिन्दू साधू

रानी लक्ष्मी बाई के शव की रक्षा हेतु बलिदान हुए थे 745 हिन्दू साधू

मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित लक्ष्मीबाई कॉलोनी में गंगादास की बड़ी शाला देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में वीरांगना लक्ष्मीबाई की पार्थिव देह की रक्षा करने वाले 745 साधुओं के पराक्रम की गवाह है, रानी लक्ष्मी बाई के शव की रक्षा हेतु बलिदान हुए थे। यह शाला रामनंदाचार्य संप्रदाय के निर्मोही अखाड़े से संबंधित है।

इतिहास अनुसार इस शाला के साधुओं ने जहां स्वतंत्रता संग्राम में भी हिस्सा लिया, तो इस पीठ की स्थापना करने वाले महंत परमानंद गोसांई ने तो अकबर को भी सिर झुकाने पर मजबूर कर दिया था।

आज भी इस शाला में साधुओं के पराक्रम की गाथा कहने वाली ढेरों चीजें मौजूद हैं। देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक यहाँ पहुंचते हैं।

इसी शाला में 745 साधुओं की समाधियां भी बनी हैं। रानी लक्ष्मीबाई की समाधि के नजदीक ही मौजूद यह समाधियां स्वाधीनता संग्राम में संतों के पराक्रम की याद दिलाती हैं।

इस शाला में वीरांगना और इन साधुओं के बलिदान की याद में अखंड ज्योति भी प्रज्ज्वलित की जाती है। हर साल18 जून को यहां संत शहीदी दिवस भी मनाया जाता है, जिसमें देशभर से साधु-संत इकट्ठे होकर वीर संतों को श्रद्धांजलि देते हैं।

यहाँ तलवार, भाले, नेजे , चिमटे जैसे हथियारों का संग्रहालय बनाया हुआ है। साथ ही1857 के युद्ध में इस्तेमाल की गई एक तोप भी मौजूद है। हर साल विजयदशमी के मौके पर इस तोप को चलाया जाता है। यह तोप 17वीं शताब्दी के अंत में बनाई गई बताई जाती है।

यह है किस्सा

1857 की क्रांति के समय इस शाला के नौवें महंत गंगादास महाराज की अगुवाई में 1200 साधुओं ने वीरांगना लक्ष्मीबाई के पार्थिव शरीर की रक्षा के लिए अंग्रेज सेना से युद्ध किया था।

मरने से पूर्व लक्ष्मीबाई ने गंगादास महाराज से दो वचन लिए थे। पहला वचन था अपने पुत्र दामोदर की रक्षा करना और दूसरा वचन था कि वीरांगना का शव भी अंग्रेज सैनिकों को न मिल पाए। इसी वचन के पालन के लिए साधुओं ने युद्ध किया था। इस दौरान 745 संतों ने वीरगति प्राप्त की थी।

शाला के संस्थापक ने अकबर को भी झुकने पर कर दिया था मजबूर

इस शाला में मुगल सम्राट अकबर की रत्न जड़ित टोपी भी मौजूद है। एक कथा अनुसार महंत परमानंद गोसांई यहां आरती व शंख ध्वनि करते थे। अकबर को इस पर ऐतराज था।

अकबर ने जब कुछ सैनिकों को भेजा, तो महंत ने योग क्रिया के माध्यम से अपने शरीर के हिस्से अलग-अलग कर दिए। ये सब देख अकबर के सैनिक भाग खड़े हुए।

अगले दिन जब दोबारा शंख और घंटे की आवाज हुई, तो अकबर ने ग्वालियर आकर महंत की चरण वंदना की और अपनी टोपी भेंट कर दी।

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