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लाल दानव के पहरुओं की भाषा बोलने वाले केजरीवाल आखिर चाहते क्या हैं?

लाल दानव के पहरुओं की भाषा बोलने वाले केजरीवाल आखिर चाहते क्या हैं?

केजरीवाल और उनके साथी..फ़क़त सत्ता के लोभी, आराजक पलायनवादी मसखरे ही नहीं हैं, जैसा कोई भी असल वाला आदमी सोचता है।

ये लोग उस माओवादी/जेएनयू छाप आराजक विचार(?)धारा का खालिस अर्क हैं.. विशुद्ध नमूना हैं, जो जन की बोटियों को चबाकर जनवाद का नारा बुलंद करती हैं। केवल नमूना ही नहीं, वे इस अराजकता के गर्वित उद्घोषक, पोषक प्रसारक हैं। (जैसा कि उन्होंने खुद कहा था)

एनजीओ इंडस्ट्री के ‘समाजसेवी’ मालिकों को देखा है आपने ? वे खुद के पास कुछ नहीं रखते। सारी पर्चियाँ, सारे बिल.. औरों के नाम से कटते हैं। होटल, क्लब, कांफ्रेस, हवाई यात्रा.. सबकुछ किसी और के खर्चे पर, ‘गरीबों के हक़ में’ !!! कल को जाँच होने पर “मेरे नाम से तो 1 पैसा भी नहीं है जी!”

केजरीवाल भी अतीत में इस एनजीओ इंडस्ट्री का हिस्सा रहे हैं, उनके तौर -तरीकों में खूब रचे-बसे है ।

एक ऐसा इंसान.. जो अपने स्वेटर में जानबूझकर छेद करवाता है या नए कपड़ों को जानबूझकर रगड़वाता है ताकि वे पुराने नज़र आएँ! (उन्हें नज़दीक से देख चुके चश्मदीदों के हवाले से)

भारत के सभी राज्यों में मुख्यमंत्री अपने अच्छे या बुरे प्रदर्शन के लिए खबरों में आते हैं। मुख्यमंत्री का काम जानते हैं? सुबह से रात तक काम से सिर उठाकर देखने तक की फुर्सत नहीं होती उसे।

मगर ये अर्धराज्य के मुख्यमंत्री काम कब करते हैं, यह बाकायदा शोध का विषय है। (दूसरे राज्यों में तांक-झांक-प्रेस कॉन्फ्रेंस-ट्वीट-रिट्वीट- फिल्म समीक्षा- व्यक्तिगत विदेश भ्रमण-प्रेस कॉन्फ्रेंस-रिट्वीट-फिल्म)

खैर, मुद्दा इतना भर नहीं है। यह व्यक्ति इस सबसे कहीं ज़्यादा आगे है, कहीं ज़्यादा खतरनाक!!

पत्रकारिता और जनसंचार तथा प्रशासन सेवा का पहला सार्वभौम नियम है कि कोई भी ऐसी बात सबके सामने नहीं कही जाती जिससे दंगे, हिंसा, गृहयुद्ध, लूट या जान-माल को खतरा हो। और हमारे केजरीवाल जी तो बाकायदा आईएएस क्लीयर कर ‘इनकम टैक्स कमिश्नर’ रह चुके हैं!

(यह बात और है कि इंडियन रेवेन्यू सर्विसेज असोसिएशन केजरीवाल के इस दावे को नकार चुकी है।)

क्या सर्वोच्च स्तर की प्रशासनिक क्षमता के दावेदार को, एक शहर.. (माफ़ कीजिए) अर्धराज्य के मुख्यमंत्री को यह शोभा देता है कि वह बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके ‘परसों से ट्रांसपोर्ट बंद हो जाने वाला है’ जैसी अफवाहें फैलाएँ?

गर इन अफवाहों के चलते अफरा-तफरी मचती है, दुकानें लुटती हैं या फसाद होते हैं तो जिम्मेदार कौन होगा?

क्या सत्ता की बाज़ी के लिए अफवाहों को हवा देना, फसादों को बुलावा जायज़ है? क्या लाशों के मंच पर चढ़कर सत्ता और पुरस्कार बटोरे बिना चैन नहीं पड़ता इन्हें ?

अख़बार शायद केजरीवाल जी ने ना पढ़ें हों (आप फ़िल्में देखने में ज़्यादा व्यस्त रहते हैं) कालेधन पर कार्रवाई के चलते जिस बुजुर्ग की मौत की ख़बर पर नाच रहे थे अखबार, उसी के संदर्भ में एक छोटा सा माफीनामा छपा है। जिस महिला की ‘आत्महत्या’ पर मीडिया गिद्ध की तरह मंडराया, चश्मदीदों के हिसाब से वह कूदी नहीं, बालकनी से गिरी थी।

अख़बार माफीनामा छापकर पवित्र हो गया, आप संदर्भ देकर मसीहा बन गए। मगर कल यदि समाज इन लोगों के परिजनों को भ्रष्ट समझें तो ज़िम्मेदारी किसकी होगी?

लाल दानव के पहरुओं की भाषा बोलने वाले केजरीवाल जैसे नेता आखिर चाहते क्या हैं? लोग शांति से लाइनों में लगने की बजाय दुकानें लूटें, यह चाहते हैं? या सडकों पर पत्थरबाजी कर गाड़ियाँ फूंकें, बसों के काँच फोड़ें, यह चाहते है?

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