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भगवान परशुराम के बिना रामायण और महाभारत दोनों अधूरी हैं

भगवान परशुराम के बिना रामायण और महाभारत दोनों अधूरी हैं

भगवान परशुराम के बिना रामायण और महाभारत दोनों अधूरी हैं

जिनका सादर नमन खुद मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम करते हों, उन शस्त्रधारी और शास्त्रज्ञ भगवान परशुराम की महिमा का वर्णन शब्दों की सीमा में संभव नहीं। भगवान परशुराम योग, वेद और नीति में निष्णात थे, तंत्र कर्म तथा ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में भी पारंगत थे, यानी जीवन और अध्यात्म की हर विद्या के महारथी।

पौराणिक मान्यता के अनुसार अक्षय तृतीया को ही त्रेता युग का प्रारंभ हुआ था। इसी दिन, यानी वैशाख शुक्ल तृतीया को सरस्वती नदी के तट पर निवास करने वाले ऋषि जमदग्नि तथा माता रेणुका के घर प्रदोषकाल में जन्मे थे भगवान परशुराम।

भगवान परशुराम जाति नहीं, अपितु अवगुण विरोधी थे

भगवान पशुपति का तप कर भगवान परशुराम परशु धारी बने और उन्होंने शस्त्र का प्रयोग कुप्रवृत्तियों का दमन करने के लिए किया। कुछ लोग कहते हैं, परशुराम ने जाति विशेष का सदैव विरोध किया, लेकिन यह तार्किक सत्य नहीं। तथ्य तो यह है कि संहार और निर्माण, दोनों में कुशल परशुराम जाति नहीं, अपितु अवगुण विरोधी थे।

गोस्वामी तुलसीदास ने किया बखान

गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में –

जो खल दंड करहुं नहिं तोरा, भ्रष्ट होय श्रुति मारग मोरा की परंपरा का ही उन्होंने भलीभांति पालन किया। परशुराम ने ऋषियों के सम्मान की पुनस्र्थापना के लिए शस्त्र उठाए। उनका उद्देश्य जाति विशेष का विनाश करना नहीं था। यदि ऐसा होता, तो वे केवल हैहय वंश को समूल नष्ट न करते। जनक, दशरथ आदि राजाओं का उन्होंने समुचित सम्मान किया।

महाभारत और रामायण दोनों काल में उपस्थित थे भगवान परशुराम

सीता स्वयंवर में भगवान श्री राम की वास्तविकता जानने के बाद प्रभु का अभिनंदन किया, तो कौरव-सभा में भगवान श्री कृष्ण का समर्थन करने में भी भगवान परशुराम ने संकोच नहीं किया। कर्ण को श्राप उन्होंने इसलिए नहीं दिया कि कुंतीपुत्र किसी विशिष्ट जाति से संबंध रखते हैं, वरन् असत्य वाचन करने के दंड स्वरूप कर्ण को सारी विद्या विस्मृत हो जाने का श्राप दिया था।

भगवान श्री राम और श्री कृष्ण को शस्त्र दिए

कहा जाता है कि रावण को मारने के लिए भगवान श्री राम को और जरासंध को मारने के लिए भगवान श्री कृष्ण को शस्त्र भगवान परशुराम ने दिए थे। इसलिए ही माना जाता है कि भगवान परशुराम के बिना रामायण और महाभारत दोनों अधूरी हैं।

भीष्म पितामह को भी सिखाई विद्या

कौशल्या पुत्र भगवान श्री राम और देवकी नंदन भगवान श्री कृष्ण से अगाध स्नेह रखने वाले भगवान परशुराम ने गंगापुत्र देवव्रत (भीष्म पितामह) को न सिर्फ युद्धकला में प्रशिक्षित किया, बल्कि यह कहकर आशीष भी दी कि संसार में किसी गुरु को ऐसा शिष्य पुन: कभी प्राप्त न होगा!

21 बार विनाश पूरी जाति नहीं सिर्फ राक्षसों का किया

भगवान परशुराम के क्रोध की चर्चा बार-बार होती है, लेकिन आक्रोश के कारणों की खोज बहुत कम हुई है। भगवान परशुराम ने प्रतिकार स्वरूप हैहयवंश के कार्तवीर्य अर्जुन की वंश-बेल का 21 बार विनाश किया था, क्योंकि कामधेनु गाय का हरण करने के लिए अर्जुनपुत्रों ने ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी थी। मगर इस दौरान उन्होंने बच्चे औरतों समेत निर्बल लोगों पर दया भाव रखते हुए सिर्फ राक्षसों का संहार किया।

भगवान श्री राम को भी इनके क्रोध का सामना करना पड़ा

भगवान पशुपति भक्त भगवान परशुराम ने भगवान श्री राम पर भी क्रोध इसलिए व्यक्त किया, क्योंकि अयोध्या नरेश ने शिव धनुष तोड़ दिया था। वाल्मीकि रामायण के बालकांड में संदर्भ है कि भगवान परशुराम ने वैष्णव धनुष पर शर-संधान करने के लिए भगवान श्री राम को कहा। जब वे इसमें सफल हुए, तब भगवान परशुराम ने भी समझ लिया कि भगवान विष्णु ने श्री राम स्वरूप धारण किया है।

भगवान परशुराम के क्रोध का सामना तो गणपति को भी करना पड़ा

भगवान मंगलमूर्ति ने भगवान परशुराम को भगवान शिव दर्शन से रोक लिया था, रुष्ट भगवान परशुराम ने उन पर परशु प्रहार किया, जिससे भगवान गणेश का एक दांत नष्ट हो गया और वे एकदंत कहलाए।

अश्वत्थामा, हनुमान और विभीषण की भांति प्रभुस्वरूप परशुराम के संबंध में भी यह बात मानी जाती है कि वे चिरजीवी हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित है

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:।

ऐसे समय में, जब शास्त्र की महिमा को पुन: मान्यता दिलाने की आवश्यकता है और शस्त्र का निरर्थक प्रयोग बढ़ चला है, भगवान परशुराम से प्रेरणा लेकर संतुलन बनाने की आवश्यकता है, ताकि मानव मात्र का कल्याण हो सके और मानवता त्राहि-त्राहि न करे।

महाभारत काल से सम्बन्धित ये वीडियो अवश्य देखें :-

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