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हिन्दू योधा
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हिन्दू योधा जो मातृभूमि के लिए शादी के मंडप से उठते ही लड़ने चला गया : भैरूंसिंह भुवांणा

हिन्दू योधा जो मात्रभूमि के लिए शादी के मंडप से उठते ही लड़ने चला गया : भैरूंसिंह भुवांणा
राजस्थान में रेवाड़ी के पास माण्डण नामक स्थान पर मुग़ल  सेनाधिकारी राव मित्रसेन अहीर कई मुस्लिम सेनापतियों के साथ सेना लेकर  शेखावाटी प्रदेश की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए तैयार खड़ा था | उधर शेखावाटी-प्रदेश के शेखावत हिन्दू योधा भी अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता की रक्षार्थ उसके सामने लड़ने के लिए खड़े हो गये | शेखावत सेना को सहयोग देने के लिए जयपुर की कछवाह सेना व भरतपुर की जाट सेना भी हथियारों से सुसज्जित होकर शाही सेना के खिलाफ आ चुकी थी|
इसी समय एक नवयुवक भैरूंसिंह भुवांणा ग्राम में तंवरों के यहां विवाह करने गया हुआ था। विवाह करके लौटने पर अपने गांव की सीमा पर पहुंचते ही उसे पता चला  कि उसके गांव के समस्त सक्षम-राजपूत हिन्दू योधा शाही सेना से युद्ध करने सिंघाणां जाकर शेखावत सेना में शामिल हो चुके हैं। जन्मजात शौर्य और स्वाभिमान से गर्वित वह नवयुवक युद्ध के मैदान में अपने सहजातियों से पीछे कैसे रह सकता था।

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वधू को बरातियों के साथ ग्राम सीमा पर ही छोड़कर दुल्हे के रूप में सजा सजाया वह वीर युद्ध में शामिल होने चल पड़ा। नव परणीता (नववधु) राजपूत बाला तंवर जी अकेली ने ही स्वसुर गृह में प्रवेश किया। विवाह के अवसर पर गृह प्रवेश के समय सम्पादन किये जाने वाले पैसारा आदि माँगलिक कार्य अधूरे ही रह गये।
 
6 जून, 1775 ई. शाही सेना व शेखावत सेना के मध्य भीषण युद्ध हुआ| अपने वीर साथियों की भांति भैरूंसिंह भी वीरता से लड़ता हुआ माण्डण के रणक्षेत्र मे वीर गति को प्राप्त हुआ।  पति के सकुशल घर लौटने की प्रतीक्षा में देवता-मनाती वीर पत्नी तंवरजी पर वज्राघात हुआ। उन बलिदानी वीर बेटी और बेटियों की बदोलत ही हिन्दुस्थान  का नाम इतिहास में अमर है।

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 माण्डणहिन्दू योधा के झुंझार भैरूसिंह की सती पत्नी के दाह स्थान पर बजावा में स्मारक के रूप में छत्री बनी हुई है। बजावा ग्राम के राजपूतों में तभी से पैसारा आदि वैवाहिक मांगलिक कृत्य जो नववधू के श्वसुर गृह प्रवेश के समय किये जाते हैं- वंर्जित हैं। विवाह करके लौटने पर वहाँ के वर-वधू सती की छत्री पर जाकर अपनी श्रृद्धा के सुमन चढ़ाते हैं।