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इस आदिवासी हिन्दू ने किया था तीरों से अंग्रेजों का सामना |
इस आदिवासी हिन्दू ने किया था तीरों से अंग्रेजों का सामना |

इस आदिवासी हिन्दू ने किया था तीरों से अंग्रेजों का सामना |

अंग्रेजों के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई में सिर्फ शहर या गावों के लोगों ने ही हिस्सा नहीं लिया बल्कि आदिवासियों ने भी इस लड़ाई में से हिस्सा लिया और अंग्रेजों को मुहं तौड जवाब दिया | बिरसा मुंडा आदिवासीयों के लिए प्रेरणा स्त्रोत्र से कम नहीं हैं | उन्होंने मुंडा आदिवासियों को एकत्रित कर देश की आज़ादी की लड़ाई में अपना बड़ा योगदान दिया | बिरसा मुंडा का जन्म 1875 इसवी को झारखंड के रांची जिले में हुआ | उनके पिता का नाम सुगना मुंडा था और वे जर्मन धर्म प्रचारकों के सहयोगी थे |बिरसा ने अपनी शिक्षा चाईबसा के जर्मन मिशन स्कूल से की | लेकिन इसाई लोगों ने उनके आदिवासी होने का उपहास बनाया और इसके जवाब हेतु उन्होंने इसाई पादरियों और इसाई धर्म का मजाक बनाया जिसके कारण उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया | इसके बाद वे स्वामी आनन्द पाण्डेय से मिले और उनसे हिन्दू धर्म और महाभारत के पत्रों के बारे में ज्ञान प्राप्त किया | इसके बाद कई आलोकिक घटनाये घटी जिससे लोग बिरसा को भगवान मानने लगे | बिरसा के स्पर्श मात्र से ही लोगों के रोग थीक हो जाते थे | 

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उन दिनों देश अग्रेजो का गुलाम था और अंग्रेजो ने सारी हदें पार कर रखीं थी | अंग्रेज बड़े पैमाने पर आदिवासिओं को इसाई बना रहे थे और उनकी जमीने हड़प रहे थे | यहीं नही अंग्रेज हमारी बेटियों के साथ भी बुरा व्यवहार कर रहे थे जिसके कारण उनके मन में अंग्रेजो के प्रति गुस्सा था | बिरसा मुंडा ने किसानो और आदिवासियों को इकट्ठा करके अंग्रेजो के विरोध में संघर्ष करने की प्रेरणा दी लेकिन अक्सर अंग्रेज उनको भीड़ इकट्ठी करने से रोकते | कई बार तो गावं वाले उनको बचा लेते लेकिन फिर गिरफ्तार होकर उनको दो वर्ष की हजारीबाग जेल ,में सजा दी गई | वे यहीं नही रुके उन्होंने जेल से रिहा होते ही अपने अनुयायियों के दो दल बनाये , एक राजनितिक कार्यों के लिए और एक हिन्दू धर्म के प्रचार के लिए | इसके लिए उन्होंने कई नये युवक भी अपने दलों में शामिल किये जिसके कारण पुलिस ने उनके खिलाफ वार्रेंट निकला लेकिन वे पकड में नही आये | बिरसा मुंडा ने 1900 में अंग्रेजो के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई का बिगुल बजा दिया और अंग्रेजो के बनाये किसी भी कानून को मानने से मना कर दिया और अंग्रेजो को भारत से जाने के लिए भी कहा और इन सभी बातों को एक घोषणा पत्र के रूप में अंग्रेजो के पास भिजवाया गया |

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इस विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजो ने ओनी सेना भेज दी | 24 दिसम्बर 1899 को उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ आन्दोलन आरम्भ कर दिया और अंग्रेजो के बनाये गये पुलिस थानों पर तीरों से आक्रमण कर आग लगा दी | इसके बाद सेना से भी आमना सामना हुआ | लेकिन ये कितने गर्व की बात थी की बिरसा मुंडा और उनकी आदिवासी सेना ने अंग्रेजो की गोलियों का सामना तीरों से किया | 3 फरवरी 1900 को बिरसा मुंडा और उनके 460 आदिवासी साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया | और 9 जून 1900 को ही उनकी रांची की जेल में रहस्यमय मौत हो गई | अंग्रेजी सरकार ने उन्हें ज़हर दे दिया और उनकी मौत का कारण हैजा बताया | केवल 25 वर्ष की छोटी आयु में उन्होंने देश के लिए बलिदान दे दिया | हमें गर्व होना चाहिए की हमारे देश में बिरसा मुंडा जैसे महान देश भक्त हुयें है |