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जानें बलूचिस्तान का हिन्दू इतिहास और अखंड भारत के लिए उसका महत्व

जानें बलूचिस्तान का हिन्दू इतिहास और अखंड भारत के लिए उसका महत्व

भारत का इतिहास विश्व में सबसे प्राचीन इतिहास है। कुछ समय पहले तक अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पाकिस्तान, आदि सब स्थान भारत के हिस्से थे। ‘अखंड भारत’ अर्थात् भारत समेत वो तमाम स्थान जो कभी भारत में आते थे। मगर कभी मुगलों ने, कभी अंग्रेजों ने तो कभी कांग्रेस जैसी पार्टियों ने भारत के ढेरों हिस्सों को खंड खंड कर भारत से दूर कर दिया।

बलूचिस्तान का हिन्दू इतिहास

आपको जानकर हैरानी होगी कि बलूचिस्तान आर्यों की प्राचीन धरती आर्यावर्त का एक हिस्सा है। वैदिक युग में आर्यों की भूमि पारस (कालांतर में फारस) से लेकर गंगा, सरयू और ब्रह्मपुत्र तक की भूमि थी जिसमें सिंधु घाटी का क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण था।

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आर्यों के पंचनंद या पंचकुल अर्थात पुरु, यदु, तुर्वस, अनु और द्रुहु थे। भारत के प्राचीन इतिहास अनुसार अफगानी, बलूच, पख्तून, पंजाबी, कश्मीरी आदि पश्‍चिम भारत के लोग पुरु वंश से संबंध रखते हैं अर्थात वे सभी पौरव हैं।

पुरु वंश में ही आगे चलकर कुरु हुए जिनके वंशज कौरव कहलाए। 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,200 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों में से पुरु का धरती के सबसे अधिक हिस्से पर राज था। बलूच भी मानते हैं कि हमारे इतिहास की शुरुआत 9 हजार वर्ष पूर्व हुई थी और बलूचिस्तान का हिन्दू इतिहास उनके लिए महत्व रखता है।

51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ हिंगलाज माता

माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ हिंगलाज माता का मंदिर बलूचिस्तान में है। माना जाता है कि बलूचिस्तान की भूमि पर दुर्गम पहाड़ियों के बीच माता का मंदिर है जहां माता का सिर गिरा था। ये मंदिर बलूचिस्तान के राज्य मंज में स्थित हिंगोल नदी के पास स्थित पहाड़ी पर है।

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इस स्थान पर भगवान श्रीराम, परशुराम के पिता जमदग्नि, गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक देवजी भी आ चुके हैं। चारणों की कुल देवी हिंगलाज की माता ही थी। ये चारण लोग बलूची ही थे और आज इनका नाम कुछ और कबीले से जुड़ा हुआ है। बलूचिस्तान में भगवान बुद्ध की सैंकड़ों मूर्तियां पाई गईं। यहां किसी काल में बौद्ध धर्म अपने चरम पर था।

16 महा-जनपदों में से एक जनपद संभवत: गांधार जनपद का हिस्सा  बलूचिस्तान

भारत के 16 महा-जनपदों में से एक जनपद संभवत: गांधार जनपद का हिस्सा बलूचिस्तान भी था। चन्द्रगुप्त मौर्य का लगभग 321 ईपू का शासन पश्चिमोत्तर में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था।

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बलूचिस्तान का वर्तमान भूगोल

बलूचिस्तान दक्षिण-पश्चिम पाकिस्तान, ईरान के दक्षिण-पूर्वी प्रांत सिस्तान तथा बलूचिस्तान और अफगानिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत तक फैला हुआ है, मगर इसका अधिकांश इलाका पाकिस्तान के कब्जे में है, जो पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा है। इसी इलाके में अधिकांश बलूच आबादी रहती है। यह सबसे गरीब और उपेक्षित इलाका भी है।

एक बलूचिस्तान कई बीमार 

उल्लेख में कहें तो बलूचिस्तान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से पर ईरान, दक्षिण-पश्चिमी हिस्से पर अफगानिस्तान और पश्चिमी भाग पर पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा है। सबसे बड़ा हिस्सा तकरीबन पाकिस्तान के कब्जे में है। चीन भी इस पर अपनी लुटेरी निगाहें रखे हुए है क्यूंकि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस संपूर्ण क्षेत्र में यूरेनियम, गैस और तेल के भंडार पाए गए हैं।

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आजाद बलूचिस्तान का भारत के लिए महत्व 

भारत की दृष्टि से देखें तो बलूचिस्तान का ग्वादर बंदरगाह ईरान, अफगान और भारत को टारगेट करने के लिए अच्छा बेस बन सकता है।

भारत ने 2003 में ईरान के साथ ओमान की खाड़ी में होर्मूज जलडमरू के बाहर चाबहार पोर्ट के विकास का समझौता किया है। यह बंदरगाह बलूचिस्तान-ईरान की सीमा के पास ईरान के सिस्तान प्रांत में है।

साथ ही पाकिस्तान से गुजरे बिना ही भारत, अफगानिस्तान पहुंच सकता है। 2015 में यह डील फाइनल हुई और अब वहां विकास कार्य शुरू हो चुका है।

बलूचिस्तान के लोग भी भारत और मोदी से उम्मीद लगायें हुए हैं कि भारत बलूचिस्तान को आजाद कराने में मदद करे। अत: तलवार अब भारत के हाथ में है और वो जब चाहे बलूचिस्तान को पाकिस्तान से अलग कर सकता है।

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