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मनुस्मृति साबित करती है आर्य विदेशी नही थें

मनुस्मृति साबित करती है आर्य विदेशी नही थें। मनुस्मृति जो एक वैदिक ग्रंथ है उसके दुसरे अध्याय 17 वें श्लोक से 24 श्लोक तक भारत का संक्षिप्त भुगोल का वर्णन है जिसे अर्थ सहित समझ सकते हैं।

सरस्वती दृषद्वत्योः देवनद्योः यदन्तरम् |
तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते ||

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कुरूक्षेत्रं च मत्सयाश्च पाञ्चालाः शुरसेनकाः |
एष ब्रह्मर्षि देशो वै ब्रह्मवर्तादन्तरः ||

एतद्‍ देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः |
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथ्वयां सर्वमानवाः ||

हिमवदविन्ध्य योर्मध्यं यत् प्राग्विशनादपि |
प्रत्यगेव प्रयागाश्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः ||

आ समुद्रात्तु वै पूर्वाद्‍ आसमुद्रात्तु पश्चिमात् |
तयोरेवान्तर गिर्यो आर्यावर्तं विदुर्बुधा ||

अर्थ-:

सरस्वती तथा दृषद्वती इन दो देवनदीयों के मध्य का जो देश है उसे देवनिर्मीत ब्रह्मावर्त कहते हैं। ब्रह्मावर्त के बाद कुरूक्षेत्र , मत्सय , पाञ्चाल और शुरसेन देश यह ब्रह्मर्षि देश हैं।

इन देशों में उत्पन्न विद्वानों से पृथ्वी पर सब मनुष्य अपने-अपने चरित्र की शिक्षा लें। हिमाचल और विन्धयाचल के बीच विनशन के पुर्व और प्रयाग के पश्चिम मध्यदेश कहा गया है।

पूर्व समुद्र तथा पश्चिम समुद्र और उन्ही दोनों पर्वतों के मध्यदेश को ज्ञानी लोग आर्यावर्त कहते हैं।

यह सभी स्थान भारतवर्ष में ही है, भारतवर्ष के बाहर का कोई उल्लेख नही है जबकि आर्य अगर विदेशी रहते तो इस वैदिक ग्रंथ में उन स्थानों का भी उल्लेख रहता लेकिन इन 5 श्लोकों में भारतवर्ष के बाहर स्थानों का कोई उल्लेख नही है जो यह साबित करता है कि आर्य विदेशी नही थें।

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