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वो मोहियाल ब्राह्मण जो इमाम हुसैन के लिए मरने तक लढ़े
वो मोहियाल ब्राह्मण जो इमाम हुसैन के लिए मरने तक लढ़े

वो मोहियाल ब्राह्मण जो इमाम हुसैन के लिए मरने तक लढ़े

महाभारत कालीन अश्वत्थामा से जुड़ी एक मान्यता के अनुसार ब्राह्मण का यह एक ऐसा वर्ग है जो अपने को मोहियाल ब्राह्मण कहलाने में गर्व महसूस करता है। मोहियाल ब्रह्मिनो को हुस्सैनी ब्राह्मण भी कहा जाता है | जो शुरुआत  से शिव के भगत हुए हैं और बहुत जबरदस्त लड़ाकू हुए हैं | हिन्दू धर्म रक्षा के लिए हर बाद जान देकर बचाते रहे हैं , इन्होने इमाम हुसैन के लिए भी जाने दी है आइए, जानते हैं इन अनूठे ब्राह्मणकी कहानी –

द्रोणाचार्य दत्त शाखा के मोहियाली ब्राह्मण थे। लोग बताते हैं कि युद्ध में घायल अश्वत्थामा किसी तरह बच निकला और इराक (मेसोपोटामिया) पहुंचकर वहीं बस गया। अश्वत्थामा वंश के दत्त ब्राrणों ने इराक में अपनी बहादुरी का सिक्का जमाया। वे अरब, मध्य एशिया, अफगानिस्तान और इराक में फैल गए। उन्होंने यहीं अपना साम्राज्य स्थापित किया।

इमाम हुसैन के परिवार के साथ सम्बन्ध

मोहम्मद  के काल में दत्त ब्राह्मण का राजा राहिब सिद्ध दत्त था। अपने साधूओं जैसे आचरण के कारण वह राहिब कहलाया। नि:संतान सिद्ध दत्त मोहम्मद साहब से संतान का आर्शीवाद मांगने मदीना गया। वहां उसे पता चला कि उसके भाग्य में औलाद नहीं है। मायूस हो कर वह लौट रहा था कि उसी समय मोहम्मद साहब के छोटे नाती हुसैन अपने नाना के साथ वहां आ रहे थे। वह निराश सिद्धदत्त को दोबारा मोहम्मद साहब के पास ले गए। नाना से सारी बात सुनकर इमाम हुसैन ने उसे सात औलादों का आशीष दिया। सिद्ध दत्त खुशी खुशी वापस आ गया। परमात्मा  ने हुसैन के आशीष की लाज रख ली। उसके घर सात बेटों का जन्म हुआ, जिनके नाम सहस राय, हर्ष राय, शेर खां, राय पुन, राम सिंह, चारू और पुरु रखे गए। पुत्र र} की प्राप्ति के बाद सिद्ध दत्त मोहम्मद साहब के खानदान का संपर्क में आये |

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राजा ने दी सभी बेटों की कुर्बानी

इमाम हुसैन के पिता हजरत अली के विरुद्ध लड़ी गई जमल की जंग में हजरत अली ने खजाने की सुरक्षा दत्त ब्राह्मण के सशस्त्र दस्ते को सौंपी। कर्बला की दुखद घटना के समय अकेले बगदाद मे 1400 ब्राह्मण रहते थे। रेहाब दत्त इमाम हुसैन का एहसान नहीं भूला था। इसीलिए जब इमाम हुसैन का दस्ता कर्बला की ओर जा रहा था उसके सैनिकों का दस्ता इमाम के साथ गया। बाद में इमाम  के कहने पर दस्ता लौट गया क्योंकि इमाम काफिले को सेना में नहीं बदलना चाहते थे। जब दस अक्टूबर 680 को कर्बला की घटना घटी और सिद्ध दत्त को पता चला तो उसे बहुत क्षोभ हुआ। जब उसे पता चला कि यजीदी फौज इमाम हुसैन के सिर को लेकर कूफा में वहां के यजीदी गर्वनर इब्ने जियाद के महल ला रहे हैं तो उसने यजीदी दस्ते का पीछा कर हुसैन का सिर छीना और दमिश्क की ओर बढ़ा। रास्ते में एक जगह पड़ाव पर रात में यजीदी सैनिकों ने उन्हें घेर लिया और हुसैन के सिर की मांग की। सिद्ध दत्त ने इमाम का सिर बचाने के लिए अपने पुत्र का सिर काट कर दे दिया पर सैनिक नहीं माने। हुसैन का सिर बचाने के लिए सिद्ध दत्त ने अपने सातों पुत्रों का सिर काट डाला लेकिन सैनिकों ने उन्हें हुसैन का सिर मानने से इंकार कर दिया। दत्त ब्राह्मण के दिल में इमाम हुसैन के कत्ल का बदला लेने की आग भड़क रही थी। इसी कारण वे अमीर मुख्तार के साथ मिल गए। बहादुरी से लड़ते हुए चुन चुन कर हुसैन के कातिलों से बदला लिया। कूफे के गवर्नर इब्ने जियाद के किले पर कब्जा कर उसे गिरा दिया गया। इस कुर्बानी को याद रखने के लिए दत्त ब्राह्मण ने दर्जनों दोहे पढ़े जो मोहर्रम में उनके घरों में पढ़े जाते थे। यही दत्त ब्राह्मण हुसैनी ब्राह्मण कहलाए।

बाद में शासकों ने शियों के साथ हुसैनी ब्राह्मण पर भी जुल्म ढाना शुरू किया तो वे सीरिया, एशिया का चक और बसरा होते हुए अफगानिस्तान की ओर आए वहां उन्होंने गजनी, बल्ख, बुखारा, और कंधार पर कब्जा कर लिया। बाद में सिंध के अटक क्षेत्र से होते हुए वह पंजाब आ गए।

पी.एन.बाली की किताब ‘द हिस्ट्री ऑफ मोहियाल्स- द लीजेंड्री पीपुल’, टी.पी.रसेल की किताब ‘द हिस्ट्री ऑफ मोहियाल्स- द मिलिटेंट ब्राहम्न रेस ऑफ इंडिया’ और शिशिर कुमार मित्र की किताब ‘द विजन ऑफ इंडिया’ के अध्ययन से पता चलता है कि प्राचीन काल में ब्राह्मण के एक वर्ग ने सैनिकों का पेशा अपनाया अपनाया। उस समय परंपरा थी कि राज्य अपने यहां कार्य करने वाले व्यक्तियों को बतौर मजदूरी भूमि प्रदान करता। यह भूमि वंशानुगत होती थी। यही लोग भूमि के मालिक हो जाते थे जो मोहियाल कहलाए।  मोहियाल भ्रह्मिन शिव क भगत हुए हैं |

भगवान परशुराम के बिना रामायण और महाभारत दोनों अधूरी हैं

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