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महमूद गजनवी के 17 आक्रमणों का पूरा सच
महमूद गजनवी के 17 आक्रमणों का पूरा सच

महमूद गजनवी के 17 आक्रमणों का पूरा सच

नवां आक्रमण : – 1018-1019 मथुरा वृन्दावन और कन्नौज मन्दिरों को लूटा गया।
दसवां आक्रमण : – 1021 ईसवीं में फिर कश्मीर पर : – असफल अभियान महमूद की बुरी हार हुई।
11 वां आक्रमण : – 1021-1022 ग्वालियर और कालिंजर असफल अभियान — मुस्लिम लेखक “ अबू गाडिर्जी” ने अपनी किताब” जैनुल अकबर “में लिखा है कि 1019 में कालिंजर पर आक्रमण में राजपूतों ने इतना प्रबल युद्ध किया की महमूद को उलटे पांव वापस गजनी जाना पड़ा। 1022 ईसवीं में महमूद फिर इस हार का बदला लेने के लिए गजनी से चला, रास्ते में ग्वालियर पर चार दिन चार रात घेरा डालने पर भी जीत की सम्भावना न देख , शांति संधि (हार) कर वह कालिंजर के लिए आगे बढ़ गया। कालिंजर का किला इतनी ऊंचाई पर था कि उस पर सीधे आक्रमण करना संभव नहीं था न ही आधार के पत्थर काटकर घुसा जा सकता था। गाडिर्जी आगे लिखता है कि महमूद ने विद्याधर को धन रत्न कपडे औरतें “ भेट “ में भेजी और कई किलों पर बातचीत कर (अधिकार मान कर ) गजनी प्रस्थान किया। यह मुस्लिम लेखको द्वारा अपने संरक्षकों को ”हारा हुआ” न दिखाने का तरीका था। महमूद को” दो बार” हराने के बाद विद्याधर ने खजुराहो में कंडारिया महादेव का मंदिर बनवाया।
12वां, 13वां ,14वां और 15वां आक्रमण कुछ विवरण नहीं मिलता

वो मोहियाल ब्राह्मण जो इमाम हुसैन के लिए मरने तक लढ़े

सोलहवां आक्रमण: – 1025 ईसवीं में महमूद का सोलहवां बहु चर्चित आक्रमण सोमनाथ पर हुआ। मन्दिर को लूटा। सोमनाथ की लूट महमूद के जीवन की सबसे बड़ी लूट कही गयी सैकड़ों मन सोना, चांदी , हीरे जवाहरात, दास, दासी गजनी ले जाये गए।

अंतिम आक्रमण : – 1026 ईसवीं में जाटों पर आक्रमण—–कहते है सोमनाथ आक्रमण से वापसी में जाटों ने बहुत तंग किया था अतः उन्हें दंड देने के लिए यह आक्रमण किया सोचने वाली बात है किस तरह तंग किया होगा : – वस्तुतः जाटों ने सोमनाथ की लूट का खजाना महमूद से छीन लिया था , उसे वापस पाने के लिए यह आक्रमण किया, पर उस के हाथ न खजाना ,न विजय हाथ लगी।


इस प्रकार हम देखते है कि पहले से पांच आक्रमण एक ही राज्य /राज परिवार राजा जयपाल व उनके पुत्रों पर हुए अतः ”एक ही“ राजनीतिक जीत गिनी जायगी। नगरकोट काँगड़ा ,थानेश्वर, मथुरा (वृन्दावन) और कन्नौज पर अभियान। मंदिरों की लूट के लिए किये कश्मीर पर “दो बार” महमूद की बुरी तरह हार हुई। कालिंजर पर “दो बार“ और ग्वालियर पर “एक बार” बुरी तरह हार का मुह देखना पड़ा। इस प्रकार एक ही राजनीतिक जीत और चार बार मंदिरों की लूट तथा पांच बार “हार” के सच पर महमूद को कितना महत्व दिया जाय यह सोचने की बात है।
महमूद गजनवी जिसके आक्रमणों का कोई राजनीतिक परिणाम न आया हो, जिससे भारतीय समाज और जन जीवन जरा भी प्रभावित न हुआ हो , उसके वापस जाते ही सब कुछ यथावत चलने लगे। इतनी महत्वहीन घटना कि सम सामयिक भारतीय लेखको ने इसका जिक्र तक न किया हो , उसे आज के भारतीय इतिहास में एक महत्व पूर्ण घटना दिखाना क्या सही है?