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दलितों का राजनीती में प्रयोग एक षड़यंत्र और इतिहास

दलितों पर लिखे इस लेख को पढ़ने से पहले जातिवाद का चश्मा उतार दें तब ही समझ में आएगा वरना नहीं..!!!

इससे पहले कि इस गंभीर विषय पर कुछ कहूं याद दिला दूँ कि भारतीय इतिहास का पहला सम्राट “चन्द्रगुप्त मौर्य” जाति से शूद्र था और उसे एक सामान्य बालक से सत्ता का शिखर पुरुष बनाने वाला चाणक्य एक ब्राम्हण था। शताब्दियों का साक्ष्य हैं भारतीय इतिहास मौर्य वंश के बिना पुर्णतः अधूरा है।

स्वतंत्रता के बाद से ही राजनैतिक स्वार्थों के लिए एक सुनियोजित षड्यंत्र के द्वारा दलित उत्थान के नाम पर जो खेल खेला गया उससे सबसे अधिक दलित ही प्रभावित हुए। दलितों से उनका पारंपरिक आय का स्रोत छीना गया। अजीब लग रहा है ना ? आइये मैं साक्ष्य देता हूँ। प्राचीन भारत जो जातियों में बंटा था उसमे प्रत्येक जाति के पास अपने रोजगार के साधन उपलब्ध थे।

कुम्हार बर्तन बनाता,लुहार लोहे का काम करता,हजाम हजामत का काम करता,अहीर पशुपालन करते,तेली तेल का धंधा करता आदि आदि..

कोई भी जाति दूसरी जाति का काम छीनने का प्रयास कभी नही करती थी। इस व्यवस्था के अनुसार दलितों का जो मुख्य पेशा था वह था पशुपालन, मांस व्यवसाय, चमड़ा व्यवसाय, और सबसे बड़ा बच्चों के जन्म के समय प्रसव कराने का कार्य।

एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत दलितों को यह एहसास दिलाया गया कि आप जो काम कर रहे हैं वह गन्दा है घृणित है। फलस्वरूप वे अपने पेशे से दूर होते गए और उनसे ये सारे धंधे छीन लिए गए।

पर दलितों के छोड़ देने से क्या ये काम बन्द हो गए ?????

आज तनिक आप नजर उठा कर देखिये चमड़ा उद्योग और मांस उद्योग का वार्षिक टर्न ओवर लाखों करोड़ों का नहीं बल्कि खरबों का है।

आज यह व्यवसाय किस के हाथ में है ???

आपकी हमारी आँखों के सामने दलितों से उनकी आमदनी का बडा स्रोत छीन कर एक विशेष समुदाय के झोले में डाल दिया गया और हम यह चाल समझ नही पाये।

उत्तर प्रदेश में  धोखेबाज नारे के जाल में दलितों को फंसा कर उन्हें अन्य हिन्दुओ विशेष कर ब्राह्मण के विरुद्ध भड़काने वालों की मंशा साफ है, वे आपको सौ टुकड़े में तोड़ कर आपके सारे हक लूटना चाहते हैं।

तनिक सोशल मिडिया में ध्यान से देखिये दलितवाद का झूठा खेल अधिकांश वे ही लोग क्यों खेल रहे हैं जिन्होंने दलितों के पेशे पर डकैती डाली है ???

दलितों की दुर्दशा के सम्बंध में जो मुख्य बातें बताई जाती हैं जरा उनका विश्लेषण कीजिये।

वे आपको बताते हैं ब्राम्हणों ने दलितों से मल ढोने का काम कराया.!!

इतिहास और प्राचीन साहित्य का कोई ज्ञाता बताये क्या प्राचीन सनातन भारत में घर के मण्डप के अंदर शौचालय निर्माण का कोई साक्ष्य मिलता है ??? कहीं भी नही।

सच तो यह है कि भारत में घर के अंदर शौचालय बनाने की परम्परा अलाउद्दीन खीलजी से लेकर मुगलकाल तक में फैली। उनके गुलाम बनायें गये लोगों में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र सभी लोग थे..।

उन्होंने ही उनसे मल ढोने का घृणित कार्य गुलाम लोगों से उनका कुफ्र या काफिर होने से घृणा की वजह से कराया। उन्होने यह घटिया काम भले ही करना पडे पर अपना धर्म को नहीं छोडना चाहते थे क्यूंकि वह अपने धर्म से दिलोजान से जूडे हुए थे।

आज भी उन दलितो की सरनेम टाइटल राजपुतो ब्राह्मणो वैश्यो के मिलेंगे। भारत के कई गांवों में तो आज से केवल तीस से चालीस वर्ष पहले तक शौचालय होते ही नही थे।

फिर इस घृणित परम्परा के लिए हिन्दू कैसे जिम्मेवार हुए ???

आपको इतना पता होगा कि मध्यकालीन भारत में हिंदुओं का सबसे ज्यादा कन्वर्जन हुआ।

जरा पता लगाइये तो क्या अपने धर्म परिवर्तन के बाद एक तेली पठान हो गया ?
कोई लुहार क्या शेख हो गया ? नहीं न..!! तेली ने धर्म बदला तो मुसलमान तेली हो गया। नाई बदला तो मुसलमान हजाम हो गया।

गांवों में देखिये, मुसलमान हजाम लोहार तेली धुनिया धोबी और यहां तक कि राजपूत भी हैं| उनका सिर्फ धर्म बदला है जातियां और कार्य नहीं।

जिन लोगों में आज दलित प्रेम जोर मार रहा है वे क्या बताएँगे कि उन्होंने अपने धर्म में जाति ख़त्म करने का क्या क्या उपाय किये???

प्राचीन भारत में दलित दुर्दशा के विषय में सोचने के पहले एक बार अपने गांव के सिर्फ पचास बर्ष पहले के इतिहास को याद कर लीजिये..!!

दलितों की स्थिति बुरी थी तो क्या अन्य जातियों की स्थिति बहुत अच्छी थी???
कठे अंवासी बिगहे बोझ (एक कट्ठा में एक मुठा और एक बीघा में एक बोझा भोजपुरी कहावत) वाले जमाने में जब हर चार पांच साल पर अकाल पड़ते तो क्या सिर्फ एक विशेष जाति के ही लोग दुःख भोगते थे ???

सत्य यह है कि उस घोर दरिद्रता के काल में सभी दुःख भोग रहे थे। कोई थोडा कम और कोई थोडा ज्यादा..!!

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