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Veer Savarkar
Veer Savarkar

Veer Savarkar – वीर सावरकर

Veer Savarkar सावरकर भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के महान सेनानी और राष्ट्रवादी नेता थे। उन्हें वीर सावरकर के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।

हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा को विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय सावरकर को जाता है। वे न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी नेता थे अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, लेखक, कवि, वक्ता और दूरदर्शी राजनेता भी थे।
वे एक ऐसे इतिहासकार भी हैं जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढँग से दुनिया के सामने रखा.

Birth of Veer Savarkar

विनायक सावरकर का जन्म महाराष्ट्र में नासिक के निकट भागुर गाँव में हुआ । उनकी माता जी का नाम राधाबाई और पिता जी का नाम दामोदर पन्त सावरकर था। इनके दो भाई गणेश (बाबाराव) व नारायण दामोदर सावरकर तथा एक बहन नैनाबाई थीं। वे 9 वर्ष के ही थे जब उनकी माता जी का हैजे की बीमारी के कारण देहांत हो गया था और इसके सात वर्ष बाद प्लेग की महामारी के कारण उनके पिता जी का भी देहांत हो गया . इसके बाद विनायक के बड़े भाई गणेश ने परिवार के पालन-पोषण का कार्य सँभाला। विनायक ने शिवाजी हाईस्कूल नासिक 1909 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। बचपन से ही वे पड़ते तो थे ही अपितु उन दिनों उन्होंने कुछ कविताएँ भी लिखी थीं।
इस अवधि में विनायक ने स्थानीय नवयुवकों को संगठित करके मित्र मेलों का आयोजन किया। शीघ्र ही इन नवयुवकों में राष्ट्रीयता की भावना के साथ क्रान्ति की ज्वाला जाग उठी . सन् 1901 में रामचन्द्र त्रयम्बक चिपलूणकर की पुत्री यमुनाबाई के साथ उनका विवाह हुआ। उनके ससुर जी ने उनकी आगे की शिक्षा का भार उठाया। लन्दन में : 1904 में उन्हॊंने अभिनव भारत नामक एक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की। 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद उन्होने पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। बाल गंगाधर तिलक के कारण 1906 में उन्हें श्यामजी कृष्ण वर्मा छात्रवृत्ति मिली। इंडियन सोशियोलाजिस्ट और तलवार नामक पत्रिकाओं में उनके अनेक लेख प्रकाशित हुये, जो बाद में कलकत्ता के युगान्तर पत्र में भी छपे। सावरकर रूसी क्रान्तिकारियों से ज्यादा प्रभावित थे।

Veer Savarkar in Holland

10 मई , को उन्होंने इंडिया हाउस, लन्दन में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयन्ती मनाई। इस अवसर पर विनायक सावरकर ने अपने भाषण में प्रमाणों सहित 1857 के संग्राम को गदर नहीं, अपितु भारत की स्वतन्त्रता का प्रथम संग्राम सिद्ध किया। जून, 1908 में इनकी पुस्तक द इण्डियन वार ऑफ इण्डिपेण्डेंस :1857 तैयार हो गयी परन्त्तु इसके पैसों की समस्या के कारण सभी प्रयास असफल रहे। बाद में यह पुस्तक किसी प्रकार गुप्त रूप से हॉलैंड से प्रकाशित हुई और इसकी प्रतियाँ फ्रांस पहुँचायी गयीं . इस पुस्तक में सावरकर ने 1857 के सिपाही विद्रोह को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ स्वतन्त्रता की पहली लड़ाई बताया। मई 1909 में इन्होंने लन्दन से वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण की, परन्तु उन्हें वहाँ वकालत करने की अनुमति नहीं मिली।
Veer Savarkar in London
1 जुलाई 1909 को मदनलाल ढींगरा के विलियम हट कर्जन वायली को गोली मार दिये जाने पर उन पर मदन लाल धींगरा को उकसाने का आरोप लगा और उनको गिरफ्तार कर लिया गया .13 मई 1910 को पैरिस से लन्दन पहुँचने पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया परन्तु 8 जुलाई 1910 को एस०एस० मोरिया नामक जहाज से भारत ले जाते हुए सीवर होल के रास्ते भाग निकले। 24 दिसम्बर 1910 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी। इसके बाद 31 जनवरी 1911 को इन्हें दोबारा आजीवन कारावास दिया गया . इस प्रकार सावरकर एकमात्र ऐसे क्रन्तिकारी थे जिनको ब्रिटिश सरकार ने दो-दो आजीवन कारावास की सजा दी थी , जो विश्व के इतिहास की पहली एवं अनोखी सजा थी। सावरकर के अनुसार – “मातृभूमि! तेरे चरणों में पहले ही मैं अपना मन अर्पित कर चुका हूँ।

Cellular Jail – Veer Savarkar

देश-सेवा ही ईश्वर-सेवा है, यह मानकर मैंने तेरी सेवा के माध्यम से भगवान की सेवा की।” सेलुलर जेल के बारे में : नासिक जिले के कलेक्टर जैकसन की हत्या के षड्यंत्र काण्ड के कारण इन्हें 7 अप्रैल, 1911 को काला पानी की सजा सुनाई गई और सेलुलर जेल भेजा गया। इस जेल में स्वतंत्रता सेनानियों को कड़ा परिश्रम करना पड़ता था। कैदियों को यहां नारियल छीलकर उसमें से तेल निकालना पड़ता था। साथ ही इन्हें यहां कोल्हू में बैल की तरह जुत कर सरसों व नारियल आदि का तेल निकालना होता था। इसके अलावा उन्हें जेल के साथ लगे व बाहर के जंगलों को साफ कर दलदली भूमी व पहाड़ी क्षेत्र को समतल भी करना होता था। रुकने पर उनको कड़ी सजा व बेंत व कोड़ों से पिटाई भी की जाती थीं। और तो और उन्हें भरपेट खाना भी नहीं दिया जाता था। 1921 में जेल से रिहा होने पर वे भारत लौटे और फिर 3 साल जेल भोगी।

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